<?xml version="1.0" encoding="utf-8" ?>
<rss version="2.0">
	<channel>
		<title>معجزات علمی قرآن - پاتولوژی در قرآن کریم</title>
		<link>http://believe.blogsky.com</link>
		<description>قسمت نظرات برای دوستان مخالف آزاد گذاشته شده اند فقط لطفا ناسزا نگویید بطور مستقیم هم به کسی توهین نکنید.</description>
		<language>fa</language>
		<generator>RSS Generated by BlogSky.com</generator>
		
			
				<item>
					<title>پاتولوژی در قرآن کریم</title>
					<link>http://believe.blogsky.com/1389/06/22/post-105/</link>
					<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;در ادامه ی مباحث مربوط به معجزات قرآن و اسلام، اکنون به یکی از معجزات شگفت‌انگیز و اعجاب‌آور قرآن کریم می‌پردازیم که هر خواننده‌ای با خواندن آن انگشت تحیّر به دندان می‌گزد.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;همانگونه که در ابتدای مقاله ی « &lt;/font&gt;&lt;a href=&quot;http://www.alvadossadegh.com/fa/1388-04-25-17-30-45/38--1/312-1388-07-05-10-09-49.html&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;طول عمر و جوانی حضرت مهدی(عج): واقعیّتی منطبق بر علم، نه افسانه&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;. » در وبسایت (وعده ی صادق) ذکر کردیم،(1) با توجّه به هجمه‌های وسیع غرب به سوی کشورهای اسلامی، لزوم دفاع از اسلام، قرآن و تشیّع بیش از هر زمانی احساس می‌شود و به جرأت می‌توان گفت که دفاع منطقی از اسلام در عصر حاضر، یکی از زمینه‌سازان ظهور خواهد بود. (ان شاءالله).&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;خوشبختانه جبهه‌ ی علمی در مقابل تهاجم غرب، زودبازده ترین و مطمئن‌ترین شیوه است و پیروزی اسلام در این جبهه، % 100 قطعی است. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;دین مبین اسلام، منطقی ترین دین آسمانی است و برخلاف ادعای دانشمندان غربی که ادیان و بخصوص دین اسلام را مخالف علم و منطق می دانند، دین اسلام بیش از هر مرام و عقیده ای بر علم و منطق استوار است. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;در واقع هر جا علم معصوم مانده و از گزند سلایق شخصی و دسایس و فتنه های دانشمندان ضد دین مصون مانده است، تماماً با تعلیمات اسلام مطابقت دارد. مباحثی همچون تکامل نیز که از سوی دانشمندان غربی به عنوان نقطه ضعف اسلام نام برده می شود، دروغ و دسیسه ای بیش نیست و ترفندی است که ماسون ها از آن برای نبرد با ادیان بهره جسته اند. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;جالب&amp;nbsp; &amp;nbsp;اینکه &amp;nbsp;&amp;nbsp;پدربزرگ &amp;nbsp;« چارلز&amp;nbsp; رابرت &amp;nbsp;داروین »، &amp;nbsp;&amp;nbsp;بنیان گذار &amp;nbsp;&amp;nbsp;نظریه ی &amp;nbsp;&amp;nbsp;تکامل&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;که « هراسموس داروین » نام داشت و او نیز مانند نوه اش زیست شناس &amp;nbsp;بود،(2) &amp;nbsp;مقام استاد اعظمی یکی از لژهای انگلستان را در اختیار داشت(3) و هم او بود که &amp;nbsp;اولین &amp;nbsp;بار ایده ی نظریه تکامل را در ذهن نوه اش &amp;nbsp;پیاده &amp;nbsp;کرد. &amp;nbsp;در&amp;nbsp; واقع « هراسموس داروین » مدت ها قبل از اینکه نوه ی مشهورش « چارلز رابرت داروین » نظریه ی تکامل را گسترش دهد، در کتاب معروف خود با عنوان (Zoonomia) ایده های اولیه ی نظریه ی تکامل را مطرح کرد(4) و بدین ترتیب نام خود را به عنوان یکی از پیشگامان نظریه ی تکامل، بر سر زبان ها انداخت.(5) &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;اما خوشبختانه امروزه با توجه به کشفیات علوم جدید، روز به روز &amp;nbsp;بر &amp;nbsp;دروغ بودن &amp;nbsp;و توطئه آمیز بودن نظریه ی تکامل، آن هم در شکل کنونی آن صحه گذارده شده است که متأسفانه با حرکت منافقانه ی بسیاری از نویسندگان ماتریالیست در کتب پزشکی و زیست شناسی، این حقایق عنوان &amp;nbsp;نشده &amp;nbsp;است. &amp;nbsp;اما ان شاء الله این حقایق در مقالات آتی به نظر خوانندگان محترم وبسایت خواهد رسید. لازم به ذکر است که نگارنده ی مقاله، خود از نظر تحصیلات در حال طی کردن مدارج عالیه ی یکی از رشته های علوم زیستی می باشد و به آنچه که می گوید واقف است.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;با توجّه به مطالب بیان شده، بر آن شدیم تا به یکی دیگر &amp;nbsp;از &amp;nbsp;معجزات &amp;nbsp;بزرگ &amp;nbsp;علمی قرآن کریم که در علم پاتولوژی (آسیب‌شناسی) بیان شده است، بپردازیم و ابعاد این معجزه‌ ی بزرگ الهی را بررسی نماییم، تا با مطالعه ی این معجزه، بیش از پیش به عظمت خداوند متعال پی ببریم. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;بعد از ذکر مقدّمه، مقاله ی اصلی را خدمتتان ارائه می‌نماییم. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&lt;img style=&quot;WIDTH: 420px; HEIGHT: 382px&quot; height=&quot;382&quot; src=&quot;http://www.alvadossadegh.com/alvadossadegh/Images/Article/Mojeze.Dar.Pathology(1-5).jpg&quot; width=&quot;420&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;قرآن، کلام خداوند و برترین کتابی است که بر دنیای خاکی نازل شده است. به جرأت می توان این کتاب عظیم را برنامه ی کامل زندگی بشر دانست؛ چرا که علاوه بر آموزش مسایل تربیتی، اخلاقی و دینی، اطلاعات گرانبهای علمی نیز در درون این کتاب مقدس نهفته می باشد که این اطلاعات به حول و قوه ی الهی با ظهور مفسر بزرگ قرآن کریم، حضرت مهدی موعود (عج) ان شاء الله رمزگشایی خواهد گشت. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;سوره ی نساء، چهارمین سوره از سوره‌های قرآن کریم می‌باشد و در زمره ی سوره‌های مدنی قرار دارد. گرچه این سوره به دلیل وجود بحث‌های فراوان پیرامون احکام و حقوق زنان، سوره ی نساء نامیده می‌شود،(6) امّا در لابه‌لای آیات آن، مطالب شگفت‌انگیز و معجزات شگفت‌آوری در علوم طبیعی نیز به چشم می‌خورد. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;در آیه ی 56 سوره ی نساء، خداوند متعال قدرت نمایی فرموده و یکی از معجزات بزرگ خود را بیان نموده است. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;آیه ی 56 سوره ی نساء چنین می‌فرماید: &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;« إِنَّ الَّذِینَ کَفَرُوا بِآیَاتِنَا سَوْفَ نُصْلِیهِمْ نَارًا کُلَّمَا نَضِجَتْ جُلُودُهُم بَدَّلْنَاهُمْ جُلُودًا غَیْرَهَا لِیَذُوقُوا الْعَذَابَ إِنَّ اللَّهَ کَانَ عَزِیزًا حَکِیمًا »&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;« کسانی که به آیات ما کافر شدند، به زودی آنها را در آتشی وارد می‌کنیم که هر گاه پوست‌های تنشان (در آن) بریان گردد و (بسوزد)، پوست‌های دیگری به جای آن قرار می‌دهیم، تا کیفر (الهی) را بچشند. خداوند توانا و حکیم است (و روی حساب، کیفر می‌دهد). »&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&lt;img style=&quot;WIDTH: 449px; HEIGHT: 172px&quot; height=&quot;172&quot; src=&quot;http://www.alvadossadegh.com/alvadossadegh/Images/Article/Mojeze.Dar.Pathology(2).jpg&quot; width=&quot;449&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&lt;img style=&quot;WIDTH: 462px; HEIGHT: 109px&quot; height=&quot;109&quot; src=&quot;http://www.alvadossadegh.com/alvadossadegh/Images/Article/Mojeze.Dar.Pathology(3).jpg&quot; width=&quot;462&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;lt;!--[if !vml]--&amp;gt; &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&lt;img style=&quot;WIDTH: 463px; HEIGHT: 64px&quot; height=&quot;64&quot; src=&quot;http://www.alvadossadegh.com/alvadossadegh/Images/Article/Mojeze.Dar.Pathology(4).jpg&quot; width=&quot;463&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;همانگونه که ملاحظه فرمودید، در آیه ی 56 سوره ی ‌نساء، خداوند متعال نحوه ی عذاب دادن کفار را در روز قیامت بیان می‌فرماید. امّا در این آیه، چه اعجازی آن هم در زمینه ی علوم طبیعی وجود دارد؟&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;برای فهم و درک بهتر اعجاز موجود در آیه ی مذکور، قبل از هر چیز باید ساختمان پوست انسان را از نظر بافت‌شناسی و پاتولوژی (آسیب‌شناسی) بررسی نماییم؛ چرا که خداوند متعال نیز در سوره ی نساء، به بریان شدن پوست کافران اشاره می‌فرماید.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;مطابق کشفیات انجام شده در علم بافت‌شناسی (هیستولوژی) و آسیب‌شناسی (پاتولوژی) پوست بدن انسان از سه لایه ی اصلی تشکیل شده است که این سه لایه به ترتیب از خارج به داخل و از سطح به عمق عبارتند از:(7)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;1 – اپیدرم&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;2 – درم&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;3 – هیپودرم&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;هر یک از سه لایه ی فوق نیز از اجزای کوچک‌تری تشکیل شده‌اند که عبارتند از:‌(8)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;1 – اجزای تشکیل دهنده ی لایه ی اپیدرم: لایه‌های تشکیل‌ دهنده ی اپیدرم از خارج به داخل و از سطح به عمق عبارتند از:(9)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;الف – لایه ی شاخی (خارجی‌ترین لایه). &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;ب – لایه ی شفاف. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;ج – لایه ی دانه‌دار. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;د – لایه ی خاردار. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;ه‍ – طبقه ی قاعده‌ای یا طبقه ی بازال.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;و – غشای پایه.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;6 لایه ی مذکور، اجزای تشکیل ‌دهنده ی اپیدرم می‌باشند. از طرف دیگر علاوه بر لایه‌های ذکر شده، سلول‌های ملانوسیت که حاوی رنگدانه بوده و مسئول به وجود آمدن رنگ‌های مختلف پوست می‌باشند نیز به صورت پراکنده &amp;nbsp;در &amp;nbsp;بین &amp;nbsp;سلول‌های لایه ی خاردار و قاعده‌ای یافت می‌شوند.(10)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;2 – اجزای تشکیل‌دهنده ی لایه ی درم: لایه ی درم از دو طبقه ی عمده تشکیل می‌شود که این لایه ها از سطح به عمق و از خارج به داخل عبارتند از:(11)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;الف – درم پاپیلر. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;ب – درم رتیکولر.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;لایه‌های مختلف درم، شباهت بسیاری به یکدیگر دارند. در سرتاسر درم، عروق (شریان ها، ورید ها و مویرگ ‌ها)، سلول‌های ایمنی، پایانه‌های عصبی، غدد و مجاری عرق، رشته‌های کلاژن و الاستیک (داربست‌های کششی و ارتجاعی پوست) وجود دارد.(12) &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;3 – لایه‌های مختلف هیپودرم: هیپودرم یک نوع بافت همبند شل می‌باشد که حاوی سلول‌های چربی بوده و پوست را به ارگان‌های زیرین می‌چسباند.(13)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;ذکر یک نکته:‌ مو یکی از ضمائم پوست می‌باشد که در بعضی نقاط بدن از جمله سر، پشت بازوها و ساعدها، بخش‌های زیادی از اندام تحتانی، شکم و پشت، صورت و نواحی شرمگاهی و زیر بغل و کشاله ی ران وجود دارد. مو ساختار ویژه‌ای دارد که مطابق آن، بخشی از اپیدرم به درون لایه‌های درم نفوذ کرده و حفره‌ای به نام فولیکول را تشکیل می‌دهد.(14) به منظور جلوگیری از اطاله ی کلام، از توضیح بیشتر در این زمینه صرف نظر می‌شود.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;lt;!--[if !vml]--&amp;gt; &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&lt;img style=&quot;WIDTH: 451px; HEIGHT: 411px&quot; height=&quot;411&quot; src=&quot;http://www.alvadossadegh.com/alvadossadegh/Images/Article/Mojeze.Dar.Pathology(1-5).jpg&quot; width=&quot;451&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;لایه های مختلف پوست. (هیپودرم&amp;nbsp; در این تصویر دیده نمی شود.)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;اعصاب موجود در پوست، از ساختمان پیچیده‌ای برخوردارند. به خصوص سیستم حسی پوست، خود دارای بخش‌های متنوعی است که این بخش‌ها عبارتند از:‌(15)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;1 – پایانه ‌های مربوط به حسّ لمس. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;2 – پایانه ‌های مربوط به حسّ فشار.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;3 – پایانه‌ های مربوط به حس گرما و سرما. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;4 – پایانه‌ های مربوط به حسّ درد.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;پایانه‌های حسّی مربوط به فشار و لمس، درون کپسول‌هایی از جنس بافت همبند احاطه شده‌اند که مجموعه ی پایانه‌های مذکور و کپسول‌های آنها را به ترتیب شبکه ی پاچینی و مایسنر می‌نامند. یعنی پایانه‌های مربوط به حسّ فشار، شبکه ی پاچینی و پایانه‌های مربوط به حسّ لمس، شبکه ی مایسنر نامیده می‌شوند.(16) گیرنده‌های مربوط به حسّ لمس و فشار، تنها در لایه ی درم وجود دارند.(17)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;گیرنده‌های مربوط به حس گرما و سرما و درد، پایانه‌های عصبی آزاد بوده و کپسول ندارند.(18) (لازم به ذکر است که مطابق یافته های جدید، پایانه های عصبی آزاد، علاوه بر حس گرما، سرما و درد، توانایی حس لمس و فشار را نیز دارند.)(19) این گیرنده‌ها علاوه بر درم، در لایه‌های تحتانی اپیدرم نیز وجود دارند.(20)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&lt;img style=&quot;WIDTH: 460px; HEIGHT: 425px&quot; height=&quot;425&quot; src=&quot;http://www.alvadossadegh.com/alvadossadegh/Images/Article/Mojeze.Dar.Pathology(6).jpg&quot; width=&quot;460&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;پایانه های عصبی حسی پوست. پایانه های عصبی آزاد، مسئول حس درد هستند.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&lt;img height=&quot;466&quot; src=&quot;http://www.alvadossadegh.com/alvadossadegh/Images/Article/Mojeze.Dar.Pathology(6.1).jpg&quot; width=&quot;407&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;address&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp; پایانه های عصبی آزاد. توجه بفرمایید که انتهای پاینه های عصبی آزاد، علاوه بر درم، تا اپیدرم نیزکشیده شده است.&lt;/font&gt;&lt;/address&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;گیرنده‌های مربوط به حس &amp;nbsp;گرما &amp;nbsp;و &amp;nbsp;سرما &amp;nbsp;و &amp;nbsp;درد &amp;nbsp;در &amp;nbsp;درک &amp;nbsp;گرما &amp;nbsp;و &amp;nbsp;سرما &amp;nbsp;و &amp;nbsp;درد،&amp;nbsp; نقش به سزایی دارند که این نقش آنها کمک بسیاری به حفاظت از بدن در مقابل آسیب‌ها می‌نماید.(21) بدین ترتیب که در صورت تماس پوست بدن با اشیاء بسیار داغ یا بسیار سرد و نیز اجسام برنده و دردناک، این گیرنده‌های حسی، بدن را از خطر به وجود آمده آگاه نموده و منجر به عکس‌العمل بدن و دوری از خطرات می‌گرداند.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;امّا توضیحات ذکر شده در رابطه با ساختمان بافت‌شناختی پوست، چه ارتباطی به اعجاز سوره ی‌ نساء دارد؟&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;قبل از ادامه ی بحث، مجدداً نگاهی به آیه ی‌ 56 سوره ی نساء می‌اندازیم:&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;‌&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;« کسانی که به آیات ما کافر شدند، به زودی آنها را در آتشی وارد می‌کنیم که هر گاه پوست‌های تنشان (در آن) بریان گردد و (بسوزد)، پوست‌های دیگری به جای آن قرار می‌دهیم، تا کیفر (الهی) را بچشند. خداوند توانا و حکیم است (و روی حساب، کیفر می‌دهد). »&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;با توجّه درآیه ی مذکور، در می‌یابیم که خداوند متعال، اسباب چشیدن عذاب آتش جهنّم را پوست بدن کافران می‌داند. چرا که می‌فرماید: « به زودی آنها را در آتشی وارد می‌کنیم که هرگاه پوست تنشان بریان گردد، پوست‌های دیگری به جای آن قرار می‌دهیم تا کیفر الهی را بچشند ».&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;در واقع در متن عربی آیه ی 56 سوره ی نساء نیز عبارت « لیذوقوا : تا بچشند » وجود دارد که نشان می‌دهد خداوند علّت جایگزین کردن پوست کافران را در قیامت، چشیدن عذاب الهی بیان کرده است. به عبارت دیگر از متن آیه به وضوح می‌توان دریافت که مطابق فرمایش خداوند، عامل درک سختی عذاب آتش جهنّم، همان پوست بدن می‌باشد و خداوند برای عذاب هر چه بیشتر کافران، این پوست را بارها به تن آنها جایگزین می‌نماید تا مبادا بعد از سوختن و زغال شدن پوست بدن آنها، ذرّه‌ای از رنج و عذاب کافران کم شود. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;این فرمایش خداوند و این منطق ذکر شده در آیه ی مذکور، به صورت کاملاً دقیقی بر کشفیّات انجام شده در علم پاتولوژی (آسیب شناسی) و بافت‌شناسی مطابقت دارد. مطابق کشفیات انجام گرفته در پاتولوژی (آسیب شناسی) و بافت‌شناسی، گیرنده‌های مربوط به حس گرما و سرما و درد در لایه‌های اپیدرم و درم پوست پراکنده شده‌اند؛(22) با توجّه به این مطلب، اگر حرارت بسیار زیاد یا عوامل محرّک دردزا بر بدن افراد وارد شود، پایانه‌های عصبی مربوط به گرما و درد که در اپیدرم و درم پراکنده هستند، این تحریکات ناشی از گرما و درد را دریافت کرده و به مغز مخابره کرده و بدن را از خطرات مذکور آگاه کرده و بدن نیز نسبت به آنها واکنش می‌دهد؛ حال اگر به هر دلیلی پایانه‌های عصبی مذکور آسیب ببینند و یا وجود نداشته باشند، حتّی اگر آسیب حرارتی یا دردناک بسیار شدیدی نیز به بدن وارد آید، بدن نمی‌تواند آنها را حس کرده و نسبت به آنها واکنش نشان دهد. در واقع اگر پوست فردی بنا به هر دلیلی کنده شود، وی نمی‌تواند داغی آتش یا درد ناشی از سوزن را در ناحیه‌ای که پوست ندارد احساس کند. به همین دلیل است که در سوختگی‌ها که پوست بدن آسیب می‌بیند، دردناک بودن یا بی‌درد بودن ضایعه ی سوخته، می‌تواند شدّت سوختگی و عمق آسیب را به خوبی نشان دهد.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;به منظور تعیین شدّت و میزان سوختگی‌های پوست، سیستم‌های درجه‌بندی متفاوتی وجود دارد. برای مثال برخی از منابع پزشکی، سوختگی‌ها را به سه درجه، برخی به چهار درجه و برخی به پنج درجه تقسیم بندی می‌نمایند؛ امّا تمام این سیستم‌های درجه‌بندی سوختگی، اساس مشترکی دارند. برای مثال کتاب جراحی شوارتز، سوختگی‌ها را به چهار درجه تقسیم بندی کرده است که درجه ی ‌دوم نیز خود به دو گروه تقسیم بندی شده است.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;مطابق تقسیم‌بندی کتاب شوارتز، سوختگی‌ها به انواع زیر تقسیم می‌شوند:(23)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;‌&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;1 – سوختگی درجه ی اوّل « سوختگی اپیدرمال »: این سوختگی، فقط لایه ی ‌اپیدرم را درگیر ساخته و موجب قرمزی سطحی و سوزش پوست می‌گردد و بیمار درد فراوانی را تجربه می‌کند.(24) علّت درک درد در بیمار، این است که در این نوع سوختگی، پایانه‌های عصبی سالم بوده و درد حاصل از آسیب به پوست را به مغز بیمار مخابره می‌کند.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;2 – سوختگی درجه ی دوم: این سوختگی خود به دو زیر گروه تقسیم بندی می‌شود که عبارتند از:(25) &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;الف – سوختگی نیمه ضخامت سطحی. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;ب – سوختگی نیمه ضخامت عمیق.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;الف – سوختگی نیمه ضخامت سطحی:‌ در این نوع سوختگی، لایه‌های فوقانی درم (درم پاپیلر) علاوه بر اپیدرم رویی آسیب دیده و پوست تاول می‌زند. در صورت برداشتن تاول، زخم صورتی رنگ و مرطوب، نمایان گشته و عبور جریان هوا از روی آن ایجاد درد می‌کند.(26) این نوع زخم سوختگی، درد شدیدی ایجاد می‌کند؛ چرا که پایانه‌های عصبی مربوط به حسّ گرما و درد موجود در درم، هنوز سالمند و هنوز تعدادی از انشعابات خود را حفظ کرده‌اند. بنابراین می‌توانند پیام حسّی گرما و درد را به مغز مخابره کنند.(27)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;ب – سوختگی نیمه ضخامت عمیق: در این نوع سوختگی، علاوه بر اپیدرم، لایه‌های سطحی‌تر (پاپیلر) و عمقی‌تر (رتیکولر) درم در اثر سوختگی آسیب دیده و در اینجا نیز تاول ایجاد می‌‌شود. در این نوع سوختگی، نمای زخم به صورت سفید و صورتی مشبّک است. بیمار در اثر این نوع سوختگی، درد چندانی حس نمی‌کند، بلکه تنها احساس ناخوشایند دارد.(28) علّت عدم درک درد توسّط بیمار در این نوع سوختگی، این است که به دلیل آسیب اپیدرم و قسمت‌های مهمّی از درم، تمام پایانه‌های عصبی مربوط به حس گرما و درد نابود شده و از بین رفته‌اند و نمی‌توانند پیام ناشی از آسیب حرارتی و درد را به مغز مخابره کنند؛ بنابراین علی‌رغم وجود آسیب شدیدتر، بیمار از درد چندانی شکایت ندارد.(29) &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;3 – سوختگی درجه ی سوم (سوختگی تمام ضخامت): در این نوع سوختگی، تمام لایه‌های درم علاوه بر اپیدرم، گرفتار شده و شدّت آسیب افزایش می‌یابد. در این حالت نمای سوختگی به رنگ سفید یا قرمز گیلاسی و یا سیاه می‌باشد و ممکن است تاول‌های عمقی نیز دیده شود.(30) درد و حساسیت چندانی در این نوع سوختگی وجود ندارد(31) که دلیل آن نیز از بین رفتن تمام پایانه‌های عصبی مربوط به مخابره ی‌ درد و حرارت می‌باشد.(32)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;4 – سوختگی درجه ی چهار: در این نوع سوختگی که بسیار شدید بوده و ناشی از آسیب‌های بسیار جدّی و خطرناک به بدن می‌باشد، علاوه بر آسیب دیدن تمام لایه‌های پوست شامل اپیدرم و درم، بافت هیپودرم (چربی زیر جلدی) و ساختارهای عمقی‌تر اعم از عصب و عضله و احشا نیز درگیر می‌شوند و سوختگی دارای ظاهری زغالی می‌گردد.(33) در این نوع از سوختگی نیز اگر بافت‌های زیرین، بافت‌های پر عصبی همچون صفاق (در ناحیه ی شکم) نباشند، بیمار مجدّداً درد چندانی احساس نخواهد کرد؛ چرا که پایانه‌های عصبی مربوط به درد و حرارت از بین رفته‌اند. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;مطابق تقسیم‌بندی دیگری که در مورد زخم‌های سوختگی وجود دارد، این نوع زخم‌ها به سه دسته ی‌ اصلی تقسیم می‌شود که این سه دسته عبارتند از:‌(34)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;1 – سوختگی درجه ی اوّل: این سوختگی شامل خارجی‌ترین لایه ی پوست که اپیدرم نام دارد، می‌گردد و زخم سوختگی در آن، قرمز، متورم و دردناک می‌باشد؛ این نوع سوختگی‌ها معمولاً تاول ندارند.(35)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;2 – سوختگی درجه ی دوم:‌ در این نوع سوختگی، شدّت آسیب بیشتر بوده و علاوه بر اپیدرم، لایه ی درم نیز درگیر می‌گردد. این زخم‌ها بسیار دردناک بوده و ظاهری صورتی ‌رنگ، مرطوب و نرم دارند. در این نوع سوختگی، تاول نیز به وجود می‌آید. در سوختگی درجه ی دوم، به دلیل وجود داشتن تعدادی از پایانه‌های مربوط به درد و حرارت، بیمار کماکان درد را حس می‌کند.(36)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;3 – سوختگی درجه ی سوم: در این نوع سوختگی، لایه‌ های عمقی‌تر پوست درگیر شده و علاوه بر اپیدرم و درم، لایه‌ی هیپودرم نیز از بین می‌رود و ممکن است علاوه بر لایه‌های مذکور، بافت‌های چربی، اعصاب بزرگ، عضلات و استخوان نیز آسیب ببینند. ظاهر این زخم‌ها سفید رنگ بوده و درد چندانی ندارند. چرا که پایانه‌های عصبی مربوط به درد و حرارت، تماماً نابوده شده‌اند.(37)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&lt;img style=&quot;WIDTH: 474px; HEIGHT: 470px&quot; height=&quot;470&quot; src=&quot;http://www.alvadossadegh.com/alvadossadegh/Images/Article/Mojeze.Dar.Pathology(7).jpg&quot; width=&quot;474&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&lt;img style=&quot;WIDTH: 407px; HEIGHT: 163px&quot; height=&quot;163&quot; src=&quot;http://www.alvadossadegh.com/alvadossadegh/Images/Article/Mojeze.Dar.Pathology(8).jpg&quot; width=&quot;407&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; درجه بندی سوختگی ها. (هرچه شدت و عمق سوختگی بیشتر می شود، درد کمتر می شود.)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;lt;!--[if !vml]--&amp;gt; &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&lt;img style=&quot;WIDTH: 445px; HEIGHT: 347px&quot; height=&quot;347&quot; src=&quot;http://www.alvadossadegh.com/alvadossadegh/Images/Article/Mojeze.Dar.Pathology(9).jpg&quot; width=&quot;445&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;lt;!--[endif]--&amp;gt; &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; درجه بندی سوختگی ها. (هرچه شدت و عمق سوختگی بیشتر می شود، درد کمتر می شود.)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;علیرغم تفاوت‌های ظاهری در تقسیم بندی‌های فوق، شباهت‌های مهم و جدی نیز بین تقسیم‌ بندی‌های مذکور وجود دارد. بدین ترتیب که مطابق هر دو طبقه‌بندی، هرچه شدّت سوختگی بیشتر می‌شود، &amp;nbsp;از شدّت درد بیمار &amp;nbsp;کاسته &amp;nbsp;می‌گردد؛ &amp;nbsp;چرا &amp;nbsp;که &amp;nbsp;با عمیق‌تر شدن سوختگی، به پایانه‌های عصبی مخابره کننده ی درد و حرارت نیز آسیب وارد شده و بدن نمی‌تواند پیام حاصل از آسیب‌های مذکور را به مغز مخابره کند.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;مطالب توصیف شده در فوق، به وضوح فرمایش قرآن در آیه ی 56 سوره ی نساء را تأیید می‌نماید. چرا که مطابق فرمایش قرآن و نیز کشفیات علمی انجام گرفته، این پوست انسان‌ها است که درد و رنج حاصل از گرمای بسیار زیاد و درد ناشی از سوختگی را به به مغز مخابره می‌نماید و فرد این رنج و عذاب را درک و حس می‌کند. به همین دلیل در جهان آخرت که معاد به دو شکل روحانی و جسمانی (توأماً) صورت می‌گیرد، برای اینکه علاوه بر عذاب روحی،‌ عذاب جسمی کافران نیز تشدید شود، می‌بایست هرگاه که در اثر شدت عذاب‌های آتش جهنم، پوست بدنشان آسیب بیند، مجدداً پوست بر تنشان رویانده شود تا آنان عذاب و سختی آتش، و درد حاصل از آن را مدام احساس نمایند و ذره‌ای از عذاب آنان کاهش نیابد. در واقع اگر پوست کافران تجدید نمی‌شد، عذاب جسمی آنان در جهنم به هیچ عنوان شدید نمی‌بود؛ چرا که بعد از اولین سوختگی پوست آنان، ‌دیگر بدنشان ابزاری برای درک حس درد و حرارت نمی داشت. به این ترتیب، خداوند با بیان این مطلب که به منظور چشاندن عذاب جهنم به کافران، بارها پوست بر تن آنها می‌رویاند،‌ حکمت خود را نشان داده و در 1400 سال قبل، آن هم در حالی که هیچ وسیله‌ای اعم از میکروسکوپ وجود نداشت، پیشگویی بسیار دقیقی پیرامون یک واقعیت علمی انجام داده است.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;آیه ی 56 سوره ی نساء، از یک واقعیت بسیار بزرگ علمی پرده بر می‌دارد. از آنجا که قرآن مجید، 1400 سال قبل و در سرزمین خشک و بی آب و علف عربستان و بر قلب یک پیامبر امّی (درس نخوانده)‌ نازل شده است،(38) جای هیچ گونه شک و شبهه‌ای باقی نمی‌ماند که این کتاب عزیز، از جانب یک پروردگار بلند مرتبه و دانا بر قلب بنده ی صالحش نازل گشته است؛ چرا که یک انسان درس نخوانده، آن هم درجامعه‌ای همچون عربستان آن روز، و نیز در شرایطی که ابزار آلات پیشرفته‌ای همچون میکروسکوپ وجود نداشت، نمی‌توانست از چنین راز علمی بزرگی با این دقّت و صلابت پرده بردارد.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;1&quot;&gt;در واقع آیه ی 56 سوره ی نساء، یکی از مهم‌ترین اسنادی است که می‌توان به کمک آن در مقابل کفّار و مشرکین، تحدّی (مبارزه طلبی) کرد و حقانیّت اسلام را به جهانیان اثبات نمود. امید است که کشفیّات علمی از این قبیل، بشر جاهل و نادان عصر آخرالزّمان را به سوی ارزش‌های الهی سوق دهد.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;</description>
					<pubDate>Mon, 13 Sep 2010 10:22:28 GMT</pubDate>
          <comments>http://believe.blogsky.com/Comments.bs?PostID=105</comments>
          <author>رامین</author>
          <guid>http://believe.blogsky.com/1389/06/22/post-105/</guid>
				</item>
			
    
	</channel>
</rss>

